योगवशिष्ट ३.१८.२९–३८
(सबसे बड़ा ब्रह्मांड और सबसे छोटी व्यक्तिगत कहानी — दोनों में कोई वास्तविक अंतर नहीं, दोनों एक ही चैतन्य में भासमान हैं)
श्रीदेव्युवाच ।
प्राक्स्मृतेर्भ्रान्तिमात्रात्मा सर्गोऽयमुदितो यथा ।
स्वप्नभ्रमात्मको भाति तथेदं कथ्यते शृणु ॥ २९ ॥
अस्ति क्वचिच्चिदाकाशे क्वचित्संसारमण्डपः ।
आकाशकाचदलवत्संस्थानाच्छादिताकृतिः ॥ ३० ॥
मेरुस्तम्भस्थलोकेशपुरन्ध्रीशालभञ्जिकः ।
चतुर्दशापवरकस्त्रिगर्तो भानुदीपकः ॥ ३१ ॥
कोणस्थभूतवल्मीकव्याप्तपर्वतलोष्टकः ।
अनेकपुत्रजरठप्रजेशब्राह्मणास्पदम् ॥ ३२ ॥
जीवौघकोशकाराढ्यो व्योमोर्ध्वतलकालिमा ।
नभोनिवाससिद्धौघमशकाहितघुंघुमः ॥ ३३ ॥
पयोदगृहधूमोग्रजालावलितकोणकः ।
वातमार्गमहावंशस्थितवैमानकीटकः ॥ ३४ ॥
सुरासुरादिदुर्बाललीलाकलकलाकुलः ।
लोकान्तरपुरग्रामभाण्डोपस्करनिर्भरः ॥ ३५ ॥
सरःस्रोतोब्धिसरसीजलोक्षितमहीतलः ।
पातालभूतलस्वर्गभागभासुरकोटरः ॥ ३६ ॥
तत्र कस्मिंश्चिदेकस्मिन्कोणेष्वम्बरकोटरे ।
शैललोष्टतलेष्वेको गिरिग्रामकगर्तकः ॥ ३७ ॥
तस्मिन्नदीशैलवनोपगूढे साग्निः सदारः सुतवानरोगः ।
गोक्षीरवान् राजभयाद्विमुक्तः सर्वातिथिर्धर्मपरो द्विजोऽभूत् ॥ ३८॥
३.१८.२९
देवी बोलीं — सुनो, पहले जो सृष्टि उत्पन्न हुई वह सिर्फ़ भ्रम मात्र थी, जैसे स्वप्न में सब कुछ सच लगता है, उसी तरह यह संसार है, मैं बताती हूँ।
३.१८.३०
शुद्ध चेतना रूपी आकाश में कहीं एक बहुत बड़ा संसार-मंडप है।
३.१८.३१
उसके सोने के खंभे मेरु पर्वत जैसे हैं, लोकपाल उसके स्तंभ हैं, देवांगनाएँ छज्जे की नाचती हुई मूर्तियाँ हैं, चौदह मंज़िलें और रेलिंग हैं, तीन परकोटे हैं, सूर्य उसका दीपक है।
३.१८.३२
कोनों में पंचमहाभूतों के बाँबी हैं, पर्वत केवल मिट्टी के ढेलों जैसे हैं, बहुत से बेटों वाले बूढ़े राजा गृहस्थ हैं, ब्राह्मण वहाँ रहते हैं।
३.१८.३३
असंख्य जीव रेशम के कीड़ों जैसे कोशों में भरे हैं, ऊपरी आकाश में काल का अंधकार छाया है, सिद्धों के समूह स्वर्ग में रहते हैं, मच्छर गुंजार कर रहे हैं।
३.१८.३४
मेघ ही उसके घर हैं जिनसे धुएँ का जाला निकलकर कोने ढक रहा है, हवाई जहाज़ हवा के रास्ते में चलते छोटे-छोटे कीड़े जैसे हैं।
३.१८.३५
देवता-असुर आदि की बाल लीला का कोलाहल भरा है, अनेक लोकों के नगर-ग्रामों का सामान-भाँड़ा से लदा हुआ है।
३.१८.३६
झीलों, नदियों, समुद्रों के जल से उसकी ज़मीन सींची हुई है, पाताल-भूतल-स्वर्ग तीन भागों में चमकते गड्ढे बने हैं।
३.१८.३७
उस आकाश-मंडप के किसी एक कोने में, पर्वत-ढेलों के बीच, एक छोटा-सा गड्ढा था जो पर्वतीय ग्राम था।
३.१८.३८
उस ग्राम में नदी-पर्वत-वन से घिरे हुए एक ब्राह्मण रहते थे — अग्नि थी, पत्नी थी, स्वस्थ पुत्र थे, गायों का दूध था, राजा का कोई डर नहीं था, हर अतिथि का सत्कार करते थे, धर्मपरायण थे।
उपदेश का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक संसार की पूर्ण मिथ्यात्व सिखाने के लिए बहुत सुंदर उपमा देते हैं। देवी कहती हैं कि सारी सृष्टि — अनन्त लोक, देवता, असुर, स्वर्ग-नरक, पर्वत-समुद्र — केवल चैतन्य आकाश में खड़ा किया हुआ एक कल्पित मंडप है, बिलकुल स्वप्न का नगर जैसा।
जो हमें बहुत बड़ा और ठोस लगता है — मेरु, सूर्य, ग्रह-नक्षत्र, देवता — उसे जान-बूझकर बहुत छोटा और खिलौना जैसा बताया गया है: खंभे, दीपक, नाचती गुड़ियाएँ, मिट्टी के ढेले, कीड़े-मकोड़े, धुआँ और मच्छरों की गुंजन। इससे सिद्ध होता है कि पूरा विश्व केवल मन का क्षणिक प्रक्षेप मात्र है, स्वप्न के सामान से ज़्यादा वास्तविक नहीं।
वर्णन धीरे-धीरे अंदर जाता है — अनन्त आकाश से → विशाल मंडप → एक कोना → पर्वत का ढेला → एक छोटा-सा ग्राम → एक साधारण ब्राह्मण का सुखी जीवन। इससे शिक्षा मिलती है कि जिसमें सारा ब्रह्मांड प्रकट हो रहा है वही चैतन्य “मेरा छोटा-सा जीवन” बनकर भी प्रकट हो रहा है। सबसे बड़ा ब्रह्मांड और सबसे छोटी व्यक्तिगत कहानी — दोनों में कोई वास्तविक अंतर नहीं, दोनों एक ही चैतन्य में भासमान हैं।
उस ब्राह्मण के पास सब कुछ है जिसकी लोग कामना करते हैं — स्वास्थ्य, पुत्र, धन, धर्म, सम्मान, राजभय से मुक्ति। फिर भी देवी ने अभी दिखाया कि उनका पूरा गाँव, शरीर, परिवार और सुख उस कल्पित मंडप के एक कोने का कण मात्र है। इससे सिद्ध होता है कि सबसे उत्तम जीवन भी स्वप्न ही है, उससे स्थायी शांति नहीं मिल सकती।
अंतिम शिक्षा यह है कि संसार केवल एक लंबी भ्रान्ति है। जब यह भ्रम टूट जाता है तब केवल शुद्ध, असीम, जन्म-मृत्यु से रहित चैतन्य शेष रहता है — जो सदा मुक्त और अपरिवर्तनीय है।
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