योगवशिष्ट ३.१८.१९–२७
(सब कुछ केवल चेतना में उठी स्मृति या संकल्प है)
लीलोवाच ।
दृश्यते कारणात्कार्यं सुविलक्षणमम्बिके ।
अम्ब्वादातुमशक्ता मृद्धटस्तज्जस्तदास्पदम् ॥ १९ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
संपद्यते हि यत्कार्यं कारणैः सहकारिभिः ।
मुख्यकारणवैचित्र्यं किंचित्तत्रावलोक्यते ॥ २० ॥
वद तद्भर्तृसर्गस्य किं पृथ्व्यादिषु कारणम् ।
तद्भूमण्डलतो भूतिर्जाता तत्र वरानने ॥ २१ ॥
गतं चेदित उड्डीय कुतः स्यादिह भूतलम् ।
सहकारीणि कानीव कारणान्यत्र कारणे ॥ २२ ॥
कारणानामभावेऽपि योदेति सहकारिता ।
तत्पूर्वकारणान्नान्यत्सर्वेणेत्यनुभूयते ॥ २३ ॥
लीलोवाच ।
स्मृतिः सा देवि मद्भर्तुस्तथा स्फारत्वमागता ।
स्मृतिस्तत्कारणं वेद्मि सर्गोऽयमिति निश्चयः ॥ २४ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
स्मृतिराकाशरूपा च यथा तज्जस्तथैव ते ।
भर्तुः सर्गोऽनुभूतोऽपि स व्योमैव तथाबले ॥ २५ ॥
लीलोवाच ।
स्मृत्याकाशमयः सर्गो यथा भर्तुर्ममोदितः ।
तथैवेममहं मन्ये स सर्गोऽत्र निदर्शनम् ॥ २६ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
एवमेतदसत्सर्गो भर्तुस्तैर्भाति भासुरः ।
तथैवायमिहाभाति पश्याम्येतदहं सुते ॥ २७ ॥
लीलोवाच ।
यथा पत्युरमूर्तोऽस्मात्सर्गात्सर्गो भ्रमात्मकः ।
जातस्तथा कथय मे जगद्भ्रमनिवृत्तये ॥ २८ ॥
३.१८.१९
महारानी लीला बोली — हे अम्बिके, कारण से कार्य उत्पन्न होता है जो उससे बिलकुल अलग होता है। मिट्टी खुद पानी नहीं पी सकती, पर उस मिट्टी का घड़ा पानी रख सकता है और पानी का आधार बन जाता है।
३.१८.२०
श्री सरस्वती देवी बोली — जो कार्य बनता है वह सहकारी कारणों के साथ मिलकर बनता है। उसमें मुख्य कारण की थोड़ी-सी विशेषता ही दिखती है।
३.१८.२१
बता, तेरे पति के सृजन का पृथ्वी आदि में क्या कारण है? उसी भूमण्डल से वहाँ उनकी सम्पत्ति उत्पन्न हुई थी, हे सुन्दर मुखवाली।
३.१८.२२
यदि वे उड़कर चले गए तो यह पृथ्वी यहाँ कैसे रहती? यहाँ सहकारी कारण कौन-कौन से हैं और मुख्य कारण क्या है?
३.१८.२३
दूसरे कारण न भी हों तब भी जो सहायता मिलती है वह केवल पहले कारण से ही आती है, और कुछ नहीं — यह सबको प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
३.१८.२४
लीला बोली — हे देवी, मेरे पति की वह स्मृति इतनी विशाल हो गई। मैं निश्चय से जानती हूँ कि यही स्मृति कारण है और यह सारा सर्ग उसी का है।
३.१८.२५
देवी बोली — स्मृति आकाश-स्वरूप है। उससे जो उत्पन्न होता है वह भी वैसा ही है। तेरे पति का सर्ग अनुभव में आने पर भी केवल आकाश ही है, हे बलवती।
३.१८.२६
लीला बोली — जैसे मेरे पति के स्मृति-आकाश में सर्ग उत्पन्न हुआ, ठीक वैसे ही मैं इस संसार को समझती हूँ। यह केवल उसका एक उदाहरण है।
३.१८.२७
देवी बोली — हाँ, ऐसा ही है। तेरे पति का असत् सर्ग उन स्मृतियों से चमक रहा है और यही संसार भी ठीक उसी तरह चमक रहा है। मैं भी स्पष्ट देख रही हूँ, हे पुत्री।
३.१८.२८
लीला बोली — जैसे आपके पति के निराकार सर्ग से यह भ्रममय सर्ग उत्पन्न हुआ, वैसा मुझे बताइए ताकि जगत् के भ्रम का नाश हो जाए।
उपदेश का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक मिट्टी और घड़े के उदाहरण से समझाते हैं कि कार्य अपने कारण से बिलकुल भिन्न गुण वाला हो सकता है। मिट्टी खुद पानी नहीं पी सकती और न उसमें पानी रह सकता है, लेकिन उसी मिट्टी से बना घड़ा पानी रखने और पिलाने में सक्षम हो जाता है। ठीक वैसे ही यह सारा जगत् अपने मूल कारण (ब्रह्म या चैतन्य) से बहुत अलग दिखता है। कारण में जो नई आकृति और व्यवस्था आती है, वही मुख्य कारण बनकर कार्य को नई शक्ति देती है।
सरस्वती जी कहती हैं कि कोई भी कार्य केवल एक कारण से नहीं बनता; बहुत-से सहकारी कारणों की जरूरत पड़ती है। वे लीला से पूछती हैं कि उनके पति के मरने के बाद भी यह पृथ्वी, महल और राज्य कैसे दिख रहे हैं? इसका उत्तर यह है कि सभी सहकारी कारण भी अंत में एक ही मूल कारण पर टिके होते हैं। जब तक हम उस एकमात्र मूल कारण को नहीं जान लेते, तब तक जगत् ठोस और वास्तविक लगता रहता है।
लीला को अचानक ज्ञान होता है कि यह सारा ब्रह्माण्ड – महल, पृथ्वी, उनका अपना शरीर – केवल उनके मृत पति की एक स्मृति का बहुत विशाल रूप है। वह स्मृति अब इतनी बड़ी हो गई है कि उसमें पूरा आकाश और संसार समा गया है। जैसे स्वप्न में सारा जगत् मन का ही बना होता है और जागने पर खाली रह जाता है, ठीक वैसे ही यह जाग्रत संसार भी केवल स्मृति या चित्त का विस्तार मात्र है; इसके बाहर कोई पदार्थ नहीं है।
सरस्वती जी पुष्टि करती हैं कि स्मृति का स्वरूप आकाश जैसा खाली और निराकार है। पति के मन में जो सृष्टि बनी थी और आज हम जो संसार देख रहे हैं, दोनों एक ही खाली आकाश जैसे हैं। दोनों चमकते जरूर हैं, अनुभव में आते जरूर हैं, लेकिन दोनों का वास्तविक अस्तित्व आकाश जितना ही है – अर्थात् शून्य। दोनों स्त्रियाँ अब स्पष्ट देख रही हैं कि यह जगत् भी ठीक उसी स्मृति-जाल की दूसरी नकल मात्र है।
अंत में लीला अंतिम प्रश्न करती है – जब पहली सृष्टि ही निराकार और भ्रम थी, तो उस पर यह दूसरी, तीसरी, अनंत भ्रांतियाँ कैसे चढ़ती चली जा रही हैं? इसी प्रश्न का उत्तर मिल जाए तो जगत् को सच मानने का भ्रम सदा के लिए खत्म हो जाता है। उपदेश यही है कि जब एक बार यह समझ में आ जाए कि सब कुछ केवल चेतना में उठी स्मृति या संकल्प है – जैसे घड़ा केवल मिट्टी की बदली हुई व्यवस्था है और स्वप्न केवल मन है – तो “मैं शरीर हूँ, यह संसार ठोस है” यह भ्रम अपने आप गिर जाता है और शाश्वत शांति रह जाती है।
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