Saturday, December 6, 2025

अध्याय ३.१८, श्लोक १–८

योगवशिष्ट ३.१८.१–८
(परम सत्य और संसार में रहना परस्पर विरोधी नहीं हैं। जागृत सिद्ध पुरुष जगत को एक चेतना की लीला जानकर उसी में विचरण करता है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्थं विनोदयामीदं दुःखदं चित्तमित्यलम् ।
बोधयित्वेङ्गितैर्भूपानास्थानादुत्थिताथ सा ॥ १ ॥
प्रविश्यान्तःपुरं भर्तुः पार्श्वेऽन्तःपुरमण्डपे ।
विवेश पुष्पगुप्तस्य चिन्तयामास चेतसा ॥ २ ॥
अहो विचित्रा मायेयमेतेऽस्मत्पुरमानवाः ।
बहिरन्तरवद्देशे तत्र चेह च संस्थिताः ॥ ३ ॥
तालीतमालहिंतालमालिता गिरयोऽप्यमी ।
यथा तत्र तथेहापि बत मायेयमातता ॥ ४ ॥
आदर्शेऽन्तर्बहिश्चैव यथा शैलोऽनुभूयते ।
बहिरन्तश्चिदादर्शे तथा सर्गोऽनुभूयते ॥ ५ ॥
तत्र भ्रान्तिमयः सर्गः कः स्यात्कः पारमार्थिकः ।
इति पृच्छामि वागीशामभ्यर्च्योक्तमसंशयम् ॥ ६॥
इति निश्चित्य तां देवीं पूजयामास सा तदा ।
ददर्श च पुरः प्राप्तां कुमारीरूपधारिणीम् ॥ ७ ॥
भद्रासनगतां देवीमुपविश्य पुरोगता।
परमार्थमहाशक्तिं लीलाऽपृच्छद्भुवि स्थिता ॥ ८ ॥

महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.१८.१  
इस प्रकार दुखी चित्त का मनोरंजन करके और उसे शान्त करके चूडाला ने इशारे से राजाओं को उठाया और सभा से चली गई।

३.१८.२  
अन्तःपुर में प्रवेश करके वह अपने पति के पास महिलाओं के मण्डप में गई और मन-ही-मन पुष्पगुप्त (चेतना के छिपे स्वरूप) पर चिन्तन करने लगी।

३.१८.३  
“अहो! यह माया कितनी विचित्र है! हमारे नगर के ये सभी मनुष्य वहाँ भी और यहाँ भी एक साथ मौजूद हैं — बाहर भी और भीतर भी।”

३.१८.४  
“ताड़, तमाल और हिन्ताल वृक्षों से सजी ये पर्वत-श्रेणियाँ वहाँ भी ठीक वैसी ही हैं जैसे यहाँ हैं — सचमुच यह माया चारों ओर फैल गई है!”

३.१८.५  
“जैसे दर्पण के भीतर और बाहर दोनों जगह एक ही पर्वत दिखाई देता है, ठीक वैसे ही चेतना रूपी दर्पण के भीतर-बाहर यह सारा सृष्टि-जगत अनुभव किया जाता है।”

३.१८.६  
“फिर कौन-सी सृष्टि भ्रान्ति है और कौन-सी परमार्थ सत्य है?” ऐसा सोचकर उसने सरस्वती जी की पूजा करके निःसंदेह उत्तर पाने का निश्चय किया।

३.१८.७  
ऐसा निश्चय करके रानी चूडाला ने देवी की पूजा की। तुरंत ही उनके सामने कुमारिका रूप धारण की हुई सरस्वती जी प्रकट हो गईं।

३.१८.८  
सुंदर आसन पर विराजमान देवी के पास बैठकर चूडाला ने पृथ्वी पर रहते हुए भी परमार्थ की महाशक्ति लीला (सरस्वती) से परम तत्त्व का प्रश्न किया।

शिक्षण का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक रानी चूडाला की उस गहरी अनुभूति को दिखाते हैं जब उन्हें समाधि में जो सूक्ष्म लोक दिखा, वह जाग्रत अवस्था के लोक से बिल्कुल एक-जैसा लगा। इससे उनका सारा संदेह मिट गया — “वह लोक” और “यह लोक” अलग-अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चेतना में एक साथ प्रकट हो रहे हैं।

पर्वत और उनके वृक्षों का एक-जैसा दिखना योगवासिष्ठ की मुख्य शिक्षा को स्पष्ट करता है — सारी सृष्टि दर्पण में प्रतिबिम्ब की तरह है। जैसे दर्पण के अंदर और बाहर एक ही पर्वत दिखता है, वैसे ही यह जगत चेतना के अंदर और बाहर दोनों जगह दिखता है, पर चेतना के अलावा कुछ है ही नहीं।

श्लोक बताते हैं कि “सत्य” और “मिथ्या” केवल देखने के दो ढंग हैं। जब तक हम शरीर-मन से तादात्म्य करते हैं तब तक यह जगत सत्य लगता है, पर जब शुद्ध चेतना के दर्पण से देखते हैं तब दोनों जगत केवल प्रतिबिम्ब मात्र हैं, स्वतंत्र सत्ता किसी की नहीं।

चूडाला का सरस्वती जी से प्रश्न करने का संकल्प यह सिखाता है कि उच्चतम सहज अनुभूति के बाद भी विद्या और वाणी की अधिष्ठात्री देवी से श्रद्धापूर्वक पुष्टि लेनी चाहिए। इससे अंतिम संदेह भी दूर हो जाता है।

कन्या रूप में सरस्वती जी का प्रकट होना और चूडाला का शरीर में रहते हुए भी परम तत्त्व का प्रश्न करना यह बोध कराता है कि परम सत्य और संसार में रहना परस्पर विरोधी नहीं हैं। जागृत सिद्ध पुरुष जगत को एक चेतना की लीला जानकर उसी में विचरण करता है।

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