योगवशिष्ट ३.१७.४१–५७
(भूत, भविष्य और वर्तमान चेतना के आकाश में एक साथ मौजूद हैं)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सा तानालोक्य ललना चिन्तापरवशाभवत् ।
तस्मिन्नगरवास्तव्याः किं ते सर्वे मृता इति ॥ ४१ ॥
पुनः प्रज्ञप्तिबोधेन प्राक्तनान्तःपुरं गता।
क्षणेन च ददर्शात्र सार्धरात्रे तथैव तान् ॥ ४२ ॥
अथ सोत्थापयामास निद्राक्रान्तं सखीजनम् ।
आह चातीव मे दुःखमास्थानं दीयतामिति ॥ ४३ ॥
भर्तुः सिंहासनस्यास्य पार्श्वे तिष्ठाम्यहं यदि ।
पश्यामि स्वभ्यसंघातं तत्प्रजीवामि नान्यथा ॥ ४४ ॥
स राजपरिवारोऽथ तयेत्युक्ते यथाक्रमम् ।
आसीद्विनिद्रः संव्यग्रः सर्वः सर्वस्वकर्मणि ॥ ४५ ॥
पौरान्सभ्यात्समानेतुं ययुर्याष्टीकपङ्क्तयः ।
व्यवहारं कलयितुमुर्व्यामर्ककरा इव ॥ ४६ ॥
आस्थानभूमिं भृत्याश्च मार्जयामासुरादृताः ।
प्रावृट्पयोदमलिन खं शरद्वासरा इव ॥ ४७ ॥
अङ्गणं प्रति दीपौघास्तस्थुः पीततमोम्भसः ।
आश्चर्यदर्शनायेव संप्राप्ता ऋक्षपङ्क्तयः ॥ ४८ ॥
जनताः पूरयामासुः पूरैरजिरभूमिकाः।
अब्धीन्प्रलयसंशुष्कान्पुरासर्ग इवाम्भसा ॥ ४९ ॥
आजग्मुर्मन्त्रिसामन्ताः स्वंस्वं स्थानमनिन्दिताः ।
त्रैलोक्ये पुनरुत्पन्ने लोकपाला यथा दिशः ॥ ५० ॥
ववुराकीर्णकर्पूरसान्द्रावश्याय शीतलाः।
उत्फुल्लकुसुमोद्वान्तमांसलामोदितानिलाः ॥ ५१ ॥
पर्यन्तेषु प्रतीहारास्तस्थुर्धवलवाससः ।
ऋष्यमूकार्कतापार्तमेघमाला इवाद्रिषु ॥ ५२ ॥
प्रभापीततमः पुञ्जाः पेतुः पुष्पोत्करा भुवि ।
चण्डमारुतविध्वस्तास्तारकानिकरा इव ॥ ५३ ॥
आस्थानं पूरयामासुर्महीपालानुयायिनः।
उत्फुल्लकमलोत्कीर्णं हंसा इव सरोवरम् ॥ ५४ ॥
सिंहासनसमीपस्थे हैमचित्रासने नवे।
उपाविशदसौ लीला लीलेव स्मरचेतसि ॥ ५५ ॥
ददर्श तान्नृपान्सर्वान्पूर्वानेव यथास्थितान् ।
गुरूनार्यान्सखीन्सभ्यान्सुहृत्संबन्धिबान्धवान् ॥ ५६ ॥
सकलमेव हि पूर्ववदेव सा समवलोक्य मुदं परमां ययौ ।
नृपतिराष्ट्रजनं खलु जीवनाभ्युदितया च बभौ शशिवच्छ्रिया ॥ ५७ ॥
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.2७.४१
उन सबको देखकर लीलाजी चिंता में डूब गईं और सोचा, “क्या इस नगर के सारे लोग मर गए?”
३.१७.४२
फिर शुद्ध ज्ञान के जागने से वे तुरंत अपने पुराने अंतःपुर में पहुँच गईं और आधी रात को भी सबको पहले जैसा ही देखा।
३.१७.४३–४४
फिर उन्होंने सोती हुई सखियों को जगाया और कहा, “मुझे बहुत दुख है, जल्दी मेरे लिए आसन लगाओ।” “अगर मैं अपने पति के सिंहासन के पास बैठकर अपने लोगों का समूह देखती रहूँगी तभी जीवित रहूँगी, नहीं तो नहीं।”
३.१७.४५–४७
ऐसा कहते ही सारा राज-परिवार जाग उठा और सब अपने-अपने काम में क्रम से लग गए। कर्मचारी नगरवासियों और सभासदों को बुलाने गए, जैसे सूर्य की किरणें पृथ्वी पर दिन का काम शुरू करने आती हैं। सेवकों ने आदर से सभा-स्थल को साफ किया, जैसे शरद ऋतु के दिन वर्षा के बादले वाले आकाश को साफ करते हैं।
३.१७.४८–५२
आँगन में अनगिनत दीपक रखे गए, मानो तारे आश्चर्य देखने नीचे उतर आए हों। लोग आँगन को पूरी तरह भर दिया, जैसे प्रलय के बाद सूखे समुद्र फिर जल से भर जाते हैं। निष्कलंक मंत्री और सामंत अपने-अपने स्थान पर आ गए, जैसे तीनों लोक फिर उत्पन्न होने पर लोकपाल दिशाओं में लौट आते हैं। कपूर से भरी ठंडी-ठंडी हवा चली, जो खिले फूलों की सुगंध से सुगंधित थी।दरवाजों पर सफेद वस्त्र वाले द्वारपाल खड़े हो गए, जैसे ऋष्यमूक पर्वत की गर्मी से दुखी मेघमाला पहाड़ों पर खड़ी हो।
३.१७.५३–५७
चमकते फूलों के ढेर धरती पर गिरने लगे, मानो तेज हवा से उड़ाई गई तारों की श्रृंखला। राजा के अनुचर सभा को भरने लगे, जैसे हंस खिले कमलों वाले सरोवर को भरते हैं। लीलाजी स्वयं सिंहासन के पास नए सोने के रंग-बिरंगे आसन पर बैठ गईं, मानो कामदेव के हृदय में लीला देवी विराजमान हों। उन्होंने सभी राजाओं, बड़े-बुजुर्गों, सखियों, सभासदों, हितैषियों, रिश्तेदारों को पहले जैसा ही देखा। सब कुछ पहले जैसा देखकर वे परम आनंद में डूब गईं। राजा, राज्य और सारी प्रजा चंद्रमा की तरह नई चाँदनी बिखेरने लगे।
उपदेश का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक राज्ञी लीलाजी की कथा के द्वारा अद्वैत वेदांत का सबसे उच्च शिक्षण देते हैं कि सम्पूर्ण विश्व केवल चेतना है और मन की संकल्प-शक्ति से ही उत्पन्न, पालित और लय होता है।
लीलाजी को सरस्वतीजी की कृपा और वसिष्ठजी के उपदेश से यह ज्ञान हो गया कि उनके पति पद्म और उनका सारा राज्य चेतना के अनंत आकाश में सूक्ष्म रूप में अभी भी मौजूद है। यह सोचकर कि “इस” जगत में सब मर गए होंगे, वे उसी संकल्प-शक्ति से पुनः अपने पुराने महल में पहुँच जाती हैं और आधी रात को भी सब कुछ आठ दिन पहले जैसा देखती हैं। इससे सिद्ध होता है कि काल, मृत्यु और परिवर्तन केवल चेतना में दिखाई देने वाली माया हैं।
जब वे कहती हैं कि केवल पति के सिंहासन के पास बैठकर अपने लोगों को देखती रहने से ही जीवित रह सकती हैं, तो यह गहरा तत्त्व बताते हैं कि अहंकार (मैं-पन) अपने विषयों—मनुष्य, स्थान, वस्तुओं—से चिपककर ही जीवित रहता है। जब तक वासना रहती है तब तक जगत दिखता है, और जब वह भी समाप्त हो जाए तब केवल शुद्ध चैतन्य रह जाता है।
उनके ऐसा कहते ही एक क्षण में सारा महल जागता है, नगर जीवित होता है, दीपक जलते हैं, फूल बरसते हैं और दरबार पहले जैसा भर जाता है। बिना किसी भौतिक क्रम के सब कुछ पुनर्जीवित हो उठता है—यह दिखाता है कि जगत हर क्षण संकल्प से नया उत्पन्न होता है। जैसे स्वप्न में एक विचार से सारी नगरी बन-बिगड़ जाती है, वैसे ही जाग्रत भी केवल मन का विस्तार है।
इसलिए मुख्य शिक्षा यही है—भूत, भविष्य और वर्तमान चेतना के आकाश में एक साथ मौजूद हैं; मृत्यु कुछ भी समाप्त नहीं करती क्योंकि चेतना के बाहर कुछ हुआ ही नहीं; जो मन दृढ़ता से मान लेता और चाहता है वही उसका अनुभव बन जाता है। जो यह जान लेता है वह आत्मा में अटल रहता है, और जो नहीं जानता वह जन्म-मृत्यु-काल की माया में दुख भोगता है।
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