योगवशिष्ट ३.१७.३१–४०
(सब कुछ केवल चेतना का खेल है—न कुछ आता है, न जाता है, न बूढ़ा होता है, न मरता है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
पपाताथ महारम्भा सा तां नरपतेः सभाम् ।
व्योमात्मिका व्योममयीं मिहिकेवाम्बराटवीम् ॥ ३१ ॥
भ्रमन्तीं तत्र तामग्रे ददृशुस्ते न केचन।
संकल्पमात्ररचितां पुरुषाः कामिनीमिव ॥ ३२ ॥
तथा ते तां न ददृशुः संचरन्तीं पुरोगताम् ।
अन्यसंकल्परचितामन्येन नगरीं यथा ॥ ३३ ॥
प्राक्तनानेव तान्सर्वान्स्वान्ददर्श सभागतान् ।
भूभृतेव सुसंप्रज्ञान्नगरान्नगरान्तरम् ॥ ३४ ॥
तद्देशांस्तत्समाचारांस्तथा तानेव बालकान् ।
ता एव बालवनितास्तांस्तानेव च मन्त्रिणः ॥ ३५ ॥
तानेव भूमिपालांश्च तांस्तानेव च पण्डितान् ।
तानेव नर्मसचिवान्भृत्यांस्तानेव तादृशान् ॥ ३६ ॥
अथान्यानप्यपूर्वांश्च पण्डितान्सुहृदस्तथा ।
व्यवहारांस्तथान्यांश्च पौरानन्यांस्तथैव च ॥ ३७ ॥
मध्याह्नकाले दिवसे घनदावाकुला दिशः ।
अन्तरिक्षं सचन्द्रार्कं साम्भोदपवनध्वनि ॥ ३८ ॥
महीरुहनदीशैलपुरपत्तनमण्डितम् ।
नानानगरविन्यास जङ्गलग्रामसंकुलम् ॥ ३९ ॥
द्विरष्टवर्षं भूपालं प्राक्तन्या जरसोज्झितम् ।
प्राक्तनीं जनतां सर्वां समस्तान्ग्रामवासिनः ॥ ४० ॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.१७.३१
तब वह विशाल आकाशमयी नगरी अचानक राजा की सभा में गिर पड़ी, जैसे कोई बादल आकाश के जंगल में गिर जाए।
३.१७.३२
वह वहाँ घूम रही थी, पर सभा में किसी ने भी उसे नहीं देखा, जैसे कोई व्यक्ति दूसरे के मन में बनी स्त्री को नहीं देख सकता।
३.१७.३३
उसी तरह वे लोग उसे देख न सके, यद्यपि वह उनके ठीक सामने घूम रही थी, जैसे एक संकल्प से बनी नगरी को दूसरे संकल्प के लोग नहीं देख सकते।
३.१७.३४
नगरी ने पहले वाले सभी लोगों को पहले जैसा ही देखा, जैसे कोई जागृत राजा एक नगर से दूसरे नगर में जाकर भी वही सब देखता है।
३.१७.३५
वही स्थान, वही रीति-रिवाज, वही बच्चे, वही युवतियाँ, वही मंत्री—सब पहले जैसे।
३.१७.३६
वही राजा, वही पंडित, वही हँसमुख मित्र, वही नौकर—सब पहले जैसे ही।
३.१७.३७
फिर उसने नए-नए पंडित, नए मित्र, नए व्यवहार और नए नगरवासियों को भी देखा जो पहले कभी नहीं थे।
३.१७.३८
दोपहर में सारा आकाश घने बादलों से ढँक गया, दिशाएँ अंधेरी हो गईं, बीच का आकाश चाँद-सूरज सहित था और बादलों-हवा की गर्जना हो रही थी।
३.१७.३९
पृथ्वी पर पेड़, नदियाँ, पर्वत, नगर और गाँव सजे हुए थे; अनेक प्रकार की नगरी, जंगल और गाँवों से भरी हुई थी।
३.१७.४०
अस्सी वर्ष का राजा था जो पहले वाली बुढ़ापे से मुक्त था, और पहले वाली सारी जनता, सारे ग्रामवासी—सब पहले जैसे ही थे।
शिक्षा का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक उस चमत्कार को बताते हैं जब एक पूरी विशाल आकाशमयी नगरी (शुद्ध चेतना) राजा पद्म की छोटी-सी सभा में प्रकट हो जाती है। इससे सिद्ध होता है कि अनंत विश्व एक क्षण में चेतना के अनंत आकाश में उत्पन्न हो सकते हैं।
वास्तव में कुछ भी एक जगह से दूसरी जगह नहीं आता-जाता। नगरी इसलिए दिखाई दी क्योंकि सभा के लोग और नगरी के लोग एक ही मानसिक तरंग (वासना) से बने थे, पर जो अपने अलग संकल्प में बँधे हैं, वे दूसरे के संकल्प से बनी दुनिया को नहीं देख सकते। इससे सिद्ध होता है कि सब कुछ केवल मन का खेल है।
प्रकट हुई नगरी पहले वाली दुनिया से बिल्कुल मिलती-जुलती भी थी (वही लोग, वही स्थान, वही राजा) और पूरी तरह नई भी थी (नए पंडित, नए मित्र, नए काम)। इससे शिक्षा मिलती है कि हर क्षण दुनिया नई सिरे से मन में बन रही है, पर स्मृति और आदत के कारण लगातार लगती है।
समय, मौसम, सूर्य-चन्द्र, पर्वत, नदियाँ, गाँव—सब कुछ हर पल नया बन रहा है। कोई पुरानी दुनिया आगे नहीं चल रही; हर बार नया स्वप्न ही है।
सबसे गहरी शिक्षा यह है कि जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, जवानी, भूत-भविष्य—सब मन के विचार मात्र हैं। जब वही पुरानी वासना उठती है तो वही पुरानी दिखने वाली दुनिया आती है, नई वासना उठे तो नई दुनिया। सब कुछ केवल चेतना का खेल है—न कुछ आता है, न जाता है, न बूढ़ा होता है, न मरता है।
No comments:
Post a Comment