योगवशिष्ट ३.१७.२१–३०
(मैं वही एक चैतन्य हूँ जिसमें यह सारा दृश्य प्रकट-पता होता है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
उत्तरद्वारगासंख्यरथहस्त्यश्वसंकुलम् ।
एकभृत्यविनिर्णीतदक्षिणापथविग्रहम् ॥ २१ ॥
कर्णाटनाथरचितपूर्वदेशक्रियाक्रमम् ।
सुराष्ट्राधिपनिर्णीतसर्वम्लेच्छोत्तरापथम् ॥ २२ ॥
मालदेशसमाक्रान्तसर्वपाश्चात्यतङ्गणम् ।
दक्षिणाब्धितटायातलङ्कादूतविनोदितम् ॥ २३ ॥
पूर्वाब्धितटमाहेन्द्रसिद्धोक्तगगनापगम् ।
उत्तराब्धितटायातदूतवर्णितगुह्यकम् ॥ २४ ॥
पश्चिमाब्धितटालोकवर्णितास्तमद्यक्रमम् ।
असंख्यवद्धभूपालकलाकीर्णाखिलाजिरम् ॥ २५ ॥
यज्ञवाटपठद्विप्र जिततूर्याग्रनिःस्वनम् ।
बन्दिकोलाहलोल्लासप्रतिश्रुद्वनकुञ्जरम् ॥ २६ ॥
गेयवाद्योद्यतध्वानप्रध्वनद्गगनान्तरम् ।
हयहस्तिरथाराजिरजोमेघघनाम्बरम् ॥ २७ ॥
पुष्पकर्पूरधूपाढ्यं गन्धामोदितपर्वतम्।
सर्वमण्डलसंभाररचितानेकशासनम् ॥ २८ ॥
यशःकर्पूरजलदसुशुभ्राम्बरपर्वतम् ।
रोदसीस्तम्भभूतैकस्वप्रतापजितार्ककम् ॥ २९ ॥
आरम्भमन्थरोदारकार्यसंव्यग्रभूमिपम् ।
नानानगरनिर्माणसोद्योगस्थपतीश्वरम् ॥ ३० ॥
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.१७.२१
उत्तर द्वार पर असंख्य रथ, हाथी, घोड़े और सैनिक भरे हुए थे; उसका एक मात्र सेवक ही दक्षिण दिशा के पूरे युद्ध को जीतकर लौट आया था।
३.१७.२२
कर्नाटक का राजा पूर्व दिशा के सारे धार्मिक कार्य पूरे कर चुका था; सौराष्ट्र का स्वामी उत्तर दिशा के सभी म्लेच्छों को पूरी तरह जीत चुका था।
३.१७.२३
मालवा का राजा सम्पूर्ण पश्चिम क्षेत्र पर कब्ज़ा कर चुका था; दक्षिण समुद्र तट से लंका का दूत आया और सबको आनन्दित कर गया।
३.१७.२४
पूर्वी समुद्र तट के महेन्द्र राजा का दूत आकाश में बहती नदियों का वर्णन करने लगा; उत्तर समुद्र तट से आया दूत गुह्यकों के गुप्त रहस्य सुनाने लगा।
३.१७.२५
पश्चिम समुद्र तट की ओर देखने वाले दूत ने सूर्यास्त देशों की वर्तमान व्यवस्था बतायी; सारा युद्धक्षेत्र असंख्य छोटे-छोटे राजाओं से भरा था जैसे मधुमक्खियों से छत्ता।
३.१७.२६
यज्ञशाला में ब्राह्मण वेदमन्त्र पढ़ रहे थे और प्रमुख युद्ध नगाड़ों को दबा रहे थे; भाटों की ऊँची प्रशंसा सुनकर हाथी चिंग्घाड़ रहे थे।
३.१७.२७
गीत और बाजे आसमान को गुँजायमान कर रहे थे; घोड़ों, हाथियों और रथों से उठी धूल ने आकाश को बादलों सा काला कर दिया था।
३.१७.२८
फूल, कपूर और धूप के ढेर से सुगन्ध फैली थी, पर्वत भी सुगन्धित लग रहे थे; सभी मण्डलों की मुहरों वाले अनेक राजाज्ञाएँ जारी हो रही थीं।
३.१७.२९
उसकी कीर्ति कपूर के चमचमाते सफेद बादल-पर्वत जैसी थी; अपनी एकमात्र तेजस्वी वीरता से उसने सूर्य को भी हरा दिया और धरती-आकाश का एकमात्र खम्भा बन गया।
३.१७.३०
राजा नये-नये बड़े-बड़े उदार कार्यों में लगे थे; मुख्य शिल्पी और स्वामी अनेक नई नगरी बनाने में पूरी ताकत से जुटे थे।
शिक्षा का विस्तृत सार:
ये दस श्लोक (३.१७.२१ से ३० तक) महर्षि वसिष्ठ द्वारा राम को महल के भीतरी भाग में दिखाई जा रही एक अद्भुत, स्वप्न-समान भव्य दृश्य का हिस्सा हैं। यह कोई साधारण सांसारिक सभा नहीं है; यह मन की आँखों के सामने उपस्थित एक जादुई साम्राज्य-वर्णन है। हर दिशा से आने वाले दूत, हर कोने से गूँजता संगीत, हर ओर फैली सुगन्ध—सब कुछ बता रहा है कि सारी पृथ्वी एक ही परमेश्वर राजा के अधीन है (जो वास्तव में शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा है)।
गूढ़ शिक्षा यह है कि सारा जगत—समुद्र, पर्वत, देश, सेनाएँ, यज्ञ, संगीत, कीर्ति और अनन्त कर्म—केवल मन का विस्तार है, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्न में एक पूरी नगरी वास्तविक लगती है। यहाँ जितने भी राजा, दूत, हाथी-घोड़े, वैभव दिखाये गये हैं, वे सब मन के कल्पना मात्र हैं; चेतना के अलावा इनका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है।
जब मन शान्त और निर्मल हो जाता है, तभी वही एक चैतन्य एकमात्र सम्राट बनकर बिना हिले-डुले सारे जगत का संचालन करता दिखायी देता है। “एक सेवक” जिसने दक्षिण जीत लिया, “एक प्रताप” जिसने सूर्य को हरा दिया, “एक खम्भा” जो धरती-आकाश को थामे है—ये सब एक ही अद्वितीय आत्मा की ओर इशारा कर रहे हैं। नई-नई नगरी बनाना और राजाज्ञाएँ जारी करना बताता है कि इच्छा और कर्म से जगत का विस्तार कैसे होता रहता है, पर यह सब क्षणिक और असत्य है।
इस प्रकार वसिष्ठ राम को समझा रहे हैं कि संसार का सबसे बड़ा साम्राज्य भी एक लम्बा स्वप्न मात्र है। इसे स्पष्ट देख लेने पर राजपाट और भोगों में आसक्ति-द्वेष अपने आप समाप्त हो जाता है।
अन्तिम मुक्ति तब मिलती है जब यह ज्ञान हो जाता है कि “मैं वही एक चैतन्य हूँ जिसमें यह सारा दृश्य प्रकट-पता होता है।” तब राजा और प्रजा का सारा भेद मिट जाता है और केवल असीम आत्मा में स्थित हो जाता है।
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