Tuesday, December 2, 2025

अध्याय ३.१७, श्लोक १०–२०

योगवशिष्ट ३.१७.१०–२०
(सब चिदाकाश की लीला मात्र है। जागृत अवस्था में भी जगत् नहीं मिटता, केवल उसकी असत्यता समझ में आ जाती है—यही परम ज्ञान है)

श्रीदेव्युवाच ।
चित्ताकाशं चिदाकाशमाकाशं च तृतीयकम् ।
द्वाभ्यां शून्यतरं विद्धि चिदाकाशं वरानने ॥ १० ॥
तच्चिदाकाशकोशात्म चिदाकाशैकभावनात् ।
अविद्यमानमप्याशु दृश्यतेऽथानुभूयते ॥ ११ ॥
देशाद्देशान्तरप्राप्तौ संविदो मध्यमेव यत् ।
निमिषेण चिदाकाशं तद्विद्धि वरवर्णिनि ॥ १२ ॥
तस्मिन्निरस्तनिःशेषसंकल्पा स्थितिमेषि चेत् ।
सर्वात्मकं पदं तत्त्वं त्वं तदाप्नोष्यसंशयम् ॥ १३ ॥
अत्यन्ताभावसंपत्त्या जगतश्चैतदाप्यते।
नान्यथा मद्वरेणाशु त्वं तु प्राप्स्यसि सुन्दरि ॥ १४ ॥

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्युक्त्वा सा ययौ देवी दिव्यमात्मीयमास्पदम् ।
लीला तु लीलयैवासीन्निर्विकल्पसमाधिभाक् ॥ १५ ॥
तत्तत्याज निमेषेण सान्तःकरणपञ्जरम् ।
स्वदेहं खमिवोड्डीना मुक्तनीडा विहंगमी ॥ १६ ॥
ददर्श खस्था भर्तारं तस्मिन्नेवालयाम्बरे ।
संस्थितं पृथिवीपालमास्थाने बहुराजनि ॥ १७ ॥
सिंहासने समारूढं जयजीवेति संस्तुतम् ।
प्रस्तुतं मण्डलानीककार्यमाहर्तुमादृतम् ॥ १८ ॥
पताकामञ्जरीकीर्णराजधानीगृहस्थितम् ।
पूर्वद्वारस्थितासंख्यमुनिविप्रर्षिमण्डलम् ॥ १९ ॥
दक्षिणद्वारगासंख्यराजराजेशमण्डलम् ।
पश्चिमद्वारगासंख्यललनालोकमण्डलम् ॥ २० ॥

३.१७.१०  
देवी बोलीं—  चित्ताकाश, चिदाकाश और तीसरा साधारण आकाश है। हे सुन्दर मुखवाली, जान कि चिदाकाश इन दोनों से भी कहीं अधिक शून्य और सूक्ष्म है।

३.१७.११  
वह चिदाकाश कोरा होते हुए भी, जैसे ही उसमें पूरी तरह एक होकर टिकती है, तुरन्त दिखाई और अनुभव होने लगता है।

३.१७.१२  
जब चेतना एक जगह से दूसरी जगह पलक झपकते पहुँचती है, बीच का जो आकाश होता है वही चिदाकाश है—हे कन्या, ऐसा जान।

३.१७.१३  
यदि उसमें सभी संकल्प पूरी तरह मिटाकर तुम स्थिर हो जाओ, तो निःसंदेह तुम सर्वात्मा परम तत्त्व को प्राप्त कर लोगी।

३.१७.१४  
इस जगत् की प्राप्ति केवल उसके अत्यन्त अभाव की सिद्धि से ही होती है, दूसरा कोई उपाय नहीं। हे मेरी प्यारी, तुम शीघ्र ही उसे पा लोगी।

३.१७.१५  
वसिष्ठ जी बोले— ऐसा कहकर देवी अपने दिव्य धाम को चली गईं। लीला ने लीला-रूप से ही तुरन्त निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गई।

३.१७.१६  
उसने पलक झपकते ही अन्तःकरण रूपी पिंजरा त्याग दिया, जैसे मुक्त नीड़ की चिड़िया आकाश में उड़ जाती है।

३.१७.१७  
आकाश में स्थित होकर उसने अपने पति को उसी महल में, आकाश-रूप राज्य में, पृथ्वी के राजा के रूप में देखा।

३.१७.१८  
सिंहासन पर विराजमान, “जय जीव” की ध्वनि से स्तुति पाते, मण्डल के राजाओं को सम्मान देने को तत्पर देखा।

३.१७.१९  
पताकाओं से भरी राजधानी, महल, पूर्व द्वार पर असंख्य मुनि-ब्राह्मण-ऋषि मण्डल देखा।

३.१७.२०  
दक्षिण द्वार पर असंख्य राजा-महाराजा, पश्चिम द्वार पर असंख्य स्त्रियों का समूह देखा।

उपदेश का विस्तृत सारांश:

देवी बताती हैं कि सच्चा आकाश चिदाकाश है—शुद्ध चैतन्य का आकाश। यह मन के आकाश और स्थूल आकाश से भी कहीं अधिक शून्य है। इसका कोई आकार नहीं, कोई स्थान नहीं, फिर भी जब इसमें पूरी तरह डूब जाओ तो तुरन्त यह दिखने और महसूस होने लगता है।

देश-देशान्तर की यात्रा चिदाकाश में ही पल भर में होती है। सारा आना-जाना इसी एकमात्र चैतन्य-आकाश में होता है। जब यह समझ में आ जाए तो पता चलता है कि वास्तव में कुछ जाता या आता ही नहीं।

जब सारे संकल्प, सारी कल्पनाएँ बिल्कुल शांत हो जाएँ और इस चिदाकाश में स्थिर हो जाओ, तो “मैं” मिट जाता है और सर्वात्म-तत्त्व प्राप्त हो जाता है। यही मुक्ति है—सब कुछ बन जाना।

जगत् को सच्चाई से जानने का एकमात्र तरीका यह समझना है कि इसका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है। जब तक हम जगत् को अलग से सच्चा मानते हैं, तब तक बन्धन रहता है। जगत् का पूर्ण अभाव ही मुक्ति का द्वार है।

लीला तुरन्त उपदेश को जी लेती है। देवी के बोलते ही वह शरीर छोड़कर निर्विकल्प समाधि में चली जाती है, जैसे पक्षी पिंजरा छोड़कर खुले आकाश में उड़ जाए। उस अवस्था में वह अपने पति और सारा राज्य पहले जैसा ही देखती है, पर अब स्पष्ट जानती है कि सब चिदाकाश की लीला मात्र है। जागृत अवस्था में भी जगत् नहीं मिटता, केवल उसकी असत्यता समझ में आ जाती है—यही परम ज्ञान है।

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