योगवशिष्ट ३.१७.१–९
(वियोग का दुःख ही परम ज्ञान का द्वार बन जाता है)
श्रीसरस्वत्युवाच ।
शवीभूतमिमं वत्से भर्तारं पुष्पपुञ्जके।
आच्छाद्य स्थापयैनं त्वं पुनर्भर्तारमेप्यसि ॥ १ ॥
पुष्पाणि म्लानिमेष्यन्ति नो नचैष विनङ्क्ष्यति ।
भूयश्च तव भर्तृत्वमचिरेण करिष्यति ॥ २ ॥
एतदीयश्च जीवोऽसावाकाशविशदस्तव ।
न निर्गमिष्यति क्षिप्रमितोऽन्तःपुरमण्डपात् ॥ ३ ॥
षट्पदश्रेणिनयना समाकर्ण्येति बन्धुभिः ।
सा समाश्वासितागत्य पयोभिरिव पद्मिनी ॥ ४ ॥
पतिं संस्थाप्य तत्रैव पुष्पपूरप्रगोपितम्।
किंचिदाश्वासिताऽतिष्ठद्दरिद्रेव निधानिनी ॥ ५ ॥
तस्मिन्नेव दिने सैषा तस्मिञ्छुद्धान्तमण्डपे ।
अर्धरात्रे परिजने सर्वस्मिन्निद्रया हृते ॥ ६ ॥
ज्ञप्तिं भगवतीं देवीं शुद्धध्यानमहाधिया ।
दुःखादाह्वाययामास सोवाच समुपेत्य ताम् ॥ ७ ॥
किं स्मृतास्मि त्वया वत्से धत्से किमिति शोकिताम् ।
संसारभ्रान्तयो भान्ति मृगतृष्णाम्बुवत्तधा ॥ ८ ॥
लीलोवाच ।
क्व ममावस्थितो भर्ता किं करोत्यथ कीदृशः ।
समीपं नय मां तस्य नैका शक्नोमि जीवितुम् ॥ ९ ॥
३.१७.१–३:
श्री सरस्वती जी बोलीं—बेटी, इस फूलों के ढेर से अपने पति के शरीर को ढँककर यहीं रख दो। तुम्हें अपना पति फिर मिल जाएगा। ये फूल मुरझा जाएँगे, पर ये नष्ट नहीं होंगे। बहुत जल्दी ही ये फिर तुम्हारे पति बन जाएँगे। इनका जीव तुम्हारा ही है, आकाश के समान निर्मल है, यह शीघ्र इस अन्तःपुर मण्डप से बाहर नहीं जाएगा।
३.१७.४–५:
भँवरे जैसे नेत्रों वाली रानी ने बन्धुओं के «तथास्तु» कहकर सान्त्वना दी तो वह जल से भरकर ताज़ी हुई कमलिनी की तरह आई। पति को वहीं फूलों के ढेर में छिपाकर रखकर वह थोड़ी शान्त हुई और खड़ी रही, जैसे कोई गरीब स्त्री अचानक खजाना पाकर खड़ी रह जाती है।
३.१७.६–८:
उसी रात उस शुद्ध अन्तःपुर मण्डप में, जब आधी रात को सारा परिजन सो चुका था; बड़ी शुद्ध ध्यान-बुद्धि से दुःख में डूबी हुई उसने भगवती ज्ञप्ति देवी को पुकारा। देवी आकर बोलीं— बेटी, मुझे क्यों याद किया? क्यों शोक कर रही हो? संसार की सब भ्रान्तियाँ मृगतृष्णा के जल की तरह हैं।
३.१७.९:
लीला बोली—मेरे पति इस समय कहाँ हैं? क्या कर रहे हैं? कैसे हैं? मुझे तुरन्त उनके पास ले चलो, मैं अकेली जी नहीं सकती।
उपदेशों का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक योगवाशिष्ठ की सबसे प्रसिद्ध कथा—रानी लीला की कथा—की शुरुआत हैं और अद्वैत वेदान्त की गहरी से गहरी शिक्षा देते हैं।
पहला उपदेश यह है कि मृत्यु केवल दिखावा है। राजा पद्म का शरीर मर चुका है, पर सरस्वती जी लीला को विश्वास दिलाती हैं कि असली पति (चेतन आत्मा) कहीं गया ही नहीं। शरीर तो फूलों जैसा है जो मुरझा जाता है, पर चैतन्य कभी नष्ट नहीं होता। मृत्यु केवल संसार के स्वप्न में एक घटना है।
दूसरा उपदेश यह कि जीव कोई छोटी चीज़ नहीं, वह आकाश जैसा विशुद्ध चैतन्य है। वह मृत्यु के समय «कहीं जाता» नहीं, केवल शरीर-मन बदलते हैं। सरस्वती कहती हैं कि वही चैतन्य बहुत शीघ्र फिर लीला का पति बनकर लौटेगा—यह आत्मा की अनन्त निरन्तरता का प्रमाण है।
तीसरा उपदेश यह कि लीला का अपने पति के लिए गहरा प्रेम और वियोग का दुःख ही परम ज्ञान का द्वार बन जाता है। उसकी एकनिष्ठ कामना इतनी प्रबल है कि वह बिना पति के जीना नहीं चाहती। यही शुद्ध एकाग्रता साधक को परम तत्त्व तक पहुँचाती है।
चौथा उपदेश तब मिलता है जब लीला शुद्ध ज्ञान की देवी को पुकारती हैं और देवी तुरन्त प्रकट होकर कहती हैं कि सारा संसारी दुःख मृगतृष्णा के जल की तरह मिथ्या है। दुनिया अज्ञान के कारण दिखती है; वास्तव में केवल एक अनन्त चैतन्य ही है।
पाँचवाँ और सबसे गहरा उपदेश आगे की कथा में आता है—लीला की पुकार «मुझे उनके पास ले चलो, मैं अकेली नहीं जी सकती» केवल प्रेम की पुकार नहीं, आत्मा की पुकार बन जाती है। उसकी इच्छा पूरी होती है, पर इस तरह कि उसे पता चलता है कि पति कभी गए ही नहीं थे। भूत, भविष्य, यह लोक, परलोक, जीवन, मृत्यु—सब कुछ उसी एक अचल चैतन्य में स्वप्नवत् दिखाई दे रहा है। इस प्रकार उसका प्रेम ही उसे पूर्ण मुक्ति दिला देता है।
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