योगवशिष्ट ३.५२.१–१५
(ये श्लोक सिखाते हैं कि हम जो बड़ा संसार देखते हैं वह सिर्फ स्वप्न जैसा भ्रम है जो किसी छोटी जगह में, जैसे मरते व्यक्ति के पास मंडप में दिखता है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एतस्मिन्नन्तरे राम लीलोवाच सरस्वतीम्।
श्वासावशेषमालोक्य मूढं भर्तारमग्रगम् ॥ १॥
प्रवृत्तो देहमुत्स्रष्टुं मद्भर्तायमिहाम्बिके ।
ज्ञप्तिरुवाच।
एवंरूपमहारम्भे संग्रामे राष्ट्रसंभ्रमे ॥ २॥
संपन्नेऽपि स्थितेऽप्युच्चैर्विचित्रारम्भमन्थरे।
न किंचिदपि संपन्नं राष्ट्रं न च महीतलम् ॥ ३॥
न स्थितं क्वचनाप्येव स्वप्नात्मकमिदं जगत्।
तस्य तन्मण्डपस्यान्तः शवस्य निकटाम्बरे ॥ ४॥
इदं भूराष्ट्रमाभाति भर्तृजीवस्य तेऽनघे।
अन्तःपुरगृहान्ते तदिदं राष्ट्रान्वितोदरम् ॥ ५॥
वसिष्ठविप्रगेहेऽन्तर्विन्ध्याद्रिग्रामके स्थितम्।
वसिष्ठविप्रगेहेन्तः शवगेहजगत्स्थितम् ॥ ६॥
शवगेहजगत्कुक्षाविदं गेहजगत्स्थितम्।
एवमेष महारम्भो जगत्त्रयमयो भ्रमः ॥ ७॥
त्वया मयाऽनयाऽनेन संयुक्तः सार्णवावनिः।
गिरिग्रामकदेहान्तर्मध्ये गगनकोशके ॥ ८॥
स्वात्मैव कचति व्यर्थो न कचत्येव वा क्वचित्।
तत्पदं परमं विद्धि नाशोत्पादविवर्जितम् ॥ ९॥
स्वयं कचितमाभातं शान्तं परमनामयम्।
किल मण्डपगेहेन्तः स्वस्वभावोदितात्मनि ॥ १०॥
एवमारम्भघनयोरपि मण्डपयोस्तयोः।
उदरे शून्यमाकाशमेवास्ति न जगद्भ्रमः ॥ ११॥
भ्रमद्रष्टुरभावे हि कीदृशी भ्रमता भ्रमे।
नास्त्येव भ्रमसत्तातो यदस्ति तदजं पदम् ॥ १२॥
भ्रमो दृश्यमसत्तस्य द्रष्टृदृश्यदशा कुतः।
द्रष्टृदृश्यक्रमाभावादद्वयं सहजं हि तत् ॥ १३॥
तत्पदं परमं विद्धि नाशोत्पादविवर्जितम्।
स्वयं कचितमाभातं शान्तमाद्यमनामयम् ॥ १४॥
किल मण्डपगेहान्तः स्वस्वभावोदितात्मनि।
विहरन्ति जनास्तत्र स्वगेहे स्वव्यवस्थया ॥ १५॥
महर्षि वसिष्ठ ने कहा:
३.५२.१–५
> इस बीच में, हे राम, लीला ने सरस्वती से कहा: केवल सांस बाकी रहने वाले मूर्ख पति को सामने पड़ा देखकर।
> वह शरीर छोड़ने को तैयार है, यह मेरा पति यहां, हे अम्बिका। ज्ञान वाली ने कहा: इस तरह के महान आरंभ में, युद्ध में और राष्ट्र की उलझन में।
> भले ही पूरा हो चुका और ऊंचे खड़ा हो, विचित्र धीमे आरंभ में, कुछ भी पूरा नहीं हुआ – न राष्ट्र और न पृथ्वी।
> कहीं भी कुछ भी स्थित नहीं है। यह संसार स्वप्न जैसा है। उसकी मंडप के अंदर, शव के पास ऊपरी आकाश में।
> यह पृथ्वी और राष्ट्र तुम्हारे पति के जीवन में दिखाई देता है, हे पवित्र। अंतःपुर घर के अंत में, वह राष्ट्र अपने अंदर के पेट वाला।
३.५२.६–११
> वसिष्ठ ब्राह्मण के घर के अंदर विन्ध्या पर्वत के गांव में स्थित। वसिष्ठ ब्राह्मण के घर के अंदर शव घर का संसार स्थित है।
> शव घर संसार के पेट के अंदर यह घर संसार स्थित है। इस तरह यह महान आरंभ तीनों संसारों का भ्रम है।
> तुम, मैं, वह और इस के साथ जुड़ा समुद्र और पृथ्वी। पर्वत गांव के शरीर के अंदर, आकाश की कोश के बीच में।
> स्वयं आत्मा ही व्यर्थ चमकता है या कहीं भी नहीं चमकता। उस परम पद को जानो जो नाश और उत्पत्ति से रहित है।
> स्वयं चमकता हुआ दिखाई देता है, शांत, परम, बिना किसी रोग का। वास्तव में मंडप घर के अंदर, अपने स्वभाव से उठे आत्मा में।
> इस तरह इन दोनों घने आरंभ वाले मंडपों के लिए भी, पेट में सिर्फ खाली आकाश है; संसार का भ्रम नहीं है।
३.५२.१२–१५
> भ्रम के द्रष्टा के न होने पर भ्रम में कैसी भटकना? भ्रम की सत्ता बिल्कुल नहीं है; जो है वह अजन्मा पद है।
> भ्रम दृश्य है, जो उसके लिए अस्तित्वहीन है। द्रष्टा और दृश्य की दशा कहां? द्रष्टा-दृश्य क्रम के अभाव से वह अद्वय और सहज है।
> उस परम पद को जानो जो नाश और उत्पत्ति से रहित है। स्वयं चमकता हुआ दिखाई देता है, शांत, आदि, बिना रोग का।
> वास्तव में मंडप घर के अंदर, अपने स्वभाव से उठे आत्मा में। लोग वहां अपने घरों में अपनी व्यवस्था के अनुसार विचरण करते हैं।
शिक्षाओं का विस्तृत सार:
भले ही युद्ध और राष्ट्र जैसे कार्य दिखें, बाहर कुछ भी वास्तव में नहीं होता या पूरा नहीं होता। श्लोक दिखाते हैं कि बड़ी चीजें छोटी चीजों के अंदर समाई हुई हैं – पृथ्वी महल में, महल गांव के घर में और घर शरीर में – इससे साबित होता है कि सब मन के अंदर है और स्वतंत्र सत्य नहीं है।
शिक्षाएं बताती हैं कि यह संसार कहीं भी वास्तविक जगह या अस्तित्व नहीं रखता क्योंकि सब स्वप्न जैसा है। दिखने वाले बड़े ढांचों के अंदर सिर्फ खाली जगह है और所谓 महान प्रयास व उलझनें खाली हैं। आत्मा ही एकमात्र चीज है जो खुद चमकती है, शांत और बिना किसी परेशानी, जन्म या मृत्यु के। लोग सोचते हैं कि वे अपने घरों में रहते हैं और अपनी योजनाएं बनाते हैं, लेकिन सब अपने स्वभाव से उठे आत्मा के अंदर हो रहा है।
भ्रम के सच्चे द्रष्टा के न होने पर भ्रम में कोई वास्तविक भटकना नहीं हो सकता। भ्रम सिर्फ देखा जाने वाला है जो सच्चे अस्तित्व में नहीं है, इसलिए अलग द्रष्टा और दृश्य नहीं है। इससे अद्वैत की समझ आती है – सब एक सहज, अजन्मा सत्य है जिसमें कोई बदलाव या क्रम नहीं है।
परम पद सृष्टि और नाश से परे है, खुद चमकता हुआ और शुरू से ही पूरी तरह शांत। भले ही संसारों और मंडपों के घने आरंभ हों, उनके अंदर सिर्फ खाली आकाश है जिसमें संसार का भ्रम बिल्कुल नहीं है। इसे जान लेने से सारी उलझन दूर हो जाती है और पता चलता है कि विशाल तीनों लोकों का भ्रम सिर्फ मन का खेल है।
अंत में श्लोक याद दिलाते हैं कि प्राणी अपने समझे गए घरों और व्यवस्थाओं में घूमते हैं, लेकिन सब अपने स्वभाव से उठे आत्मा के अंदर होता है। सच्ची बुद्धि इस अपरिवर्तनीय परम सत्य को जानने में है जो बिना किसी रोग या हानि के है, जहां आत्मा अकेली बिना बाहरी सहारे के मौजूद है।
No comments:
Post a Comment