Sunday, March 1, 2026

अध्याय ३.४३, श्लोक १–२०

योगवशिष्ट ३.४३.१–२०
(ये श्लोक एक नाटकीय कथा का हिस्सा हैं जहाँ सरस्वती राजा को मृत्यु, पुनर्जन्म और संसार की शक्ति की माया के बारे में बताती हैं)

श्रीसरस्वत्युवाच ।
अस्मिन् रणवरे राजन्मर्तव्यं भवताधुना।
प्राप्तव्यं प्राक्तनं राज्यं सर्वं प्रत्यक्षमेव ते ॥ १ ॥
कुमार्या मन्त्रिणा चैव त्वया च प्राक्तनं पुरम् ।
आगन्तव्यं शवीभूतं प्राप्तव्यं तच्छरीरकम् ॥ २ ॥
आवां यावो यथायातं वातरूपेण च त्वया ।
आगन्तव्यः स देशस्तु कुमार्या मन्त्रिणापि च ॥ ३ ॥
अन्यैव गतिरश्वस्य गतिरन्या खरोष्ट्रयोः ।
मदस्विन्नकपोलस्य गतिरन्यैव दन्तिनः ॥ ४ ॥
प्रस्तुतेति कथा यावन्मिथो मधुरभाषिणोः ।
तावत्प्रविश्य संभ्रान्त उवाचोर्ध्वस्थितो नरः ॥ ५ ॥
देव सायकचक्रासिगदापीरघवृष्टिमत्।
महत्परबलं प्राप्तमेकार्णव इवोद्धतः ॥ ६ ॥
कल्पकालानिलोद्धूतकुलाचलशिलोपमम् ।
गदाशक्तिभुशुण्डीनां वृष्टिं मुञ्चति तुष्टिमत् ॥ ७ ॥
नगरे नगसंकाशे लग्नोऽग्निर्व्याप्तदिक्तटः ।
दहंश्चटचटास्फोटैः पातयत्युत्तमां पुरीम् ॥ ८ ॥
कल्पाम्बुदघटातुल्या व्योम्नि धूममहाद्रयः ।
बलात्प्रोड्डयनं कर्तुं प्रवृत्ता गरुडा इव ॥ ९ ॥

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ससंभ्रमं वदत्येवं पुरुषे परुषारवः ।
उदभूत्पूरयन्नाशा बहिः कोलाहलो महान् ॥ १० ॥
बलादाकर्णकृष्टानां धनुषां शरवर्षिणाम् ।
बृंहतामतिमत्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम् ॥ ११ ॥ >>>
तरदुल्मुकखण्डोग्रतारातरलिताम्बरम् ।
अन्योन्यदेशसद्मौघप्रज्वलज्ज्वलनाचलम् ॥ १९ ॥
हतसैन्यपुरापातं द्रुताङ्गाराभ्रकोटरैः।
कर्कशाक्रन्दनिर्दग्धलोकपूगोग्रगर्जितम् ॥ २० ॥

देवी सरस्वती बोलीं: 
३.४३.१–४ 
> हे राजन्, इस महान युद्ध में अब तुम्हें मरना है। तुम्हें अपना पूर्व का राज्य प्राप्त होगा, और सब कुछ तुम्हारे लिए प्रत्यक्ष हो जाएगा।
> कुमारी, मन्त्री और तुम्हें अपने पूर्व के नगर जाना है। वहाँ शव बन चुका शरीर मिलेगा, और तुम्हें वह शरीर प्राप्त करना है।
> हम दोनों जैसे आए थे वैसे ही वायु रूप में जाएँगे। तुम्हें भी उस देश में पहुँचना है, कुमारी और मन्त्री के साथ।
> घोड़े की चाल एक प्रकार की है, गधे-ऊँट की दूसरी, और मद से भीगे गालों वाले हाथी की चाल बिलकुल अलग है।

३.४३.५–९  
> जब दोनों के बीच यह मधुर बातचीत चल रही थी, तभी घबराहट में एक व्यक्ति ऊपर खड़े होकर प्रवेश कर बोला।
> हे देव, बाण, चक्र, तलवार, गदा और हथियारों की वर्षा करने वाला महान शत्रु सेना आ पहुँचा है, जो उफनते समुद्र की तरह है।
> यह कल्प के अंत की हवा से उखड़े पहाड़ों जैसी गदा, शक्ति और भुशुण्डियों की वर्षा करती है, और प्रसन्न होकर छोड़ती है।
> पहाड़ जैसा नगर अग्नि से जल रहा है, दिशाओं तक फैलकर, चटचट शब्दों से जलाकर उत्तम पुरी को गिरा रहा है।
> आकाश में कल्प के बादलों के घड़े जैसे धुएँ के बड़े पहाड़ उड़ रहे हैं, गरुड़ों की तरह बलपूर्वक ऊपर उठ रहे हैं।

महर्षि वसिष्ठ बोले: 
३.४३.१०–११
> जब वह व्यक्ति घबराहट में बोल रहा था, तब दिशाओं को भरते हुए महान कोलाहल बाहर उठा।
> कान तक खींचे धनुषों से बाणों की वर्षा, अत्यन्त उन्मत्त और वेगवान हाथियों की गर्जना...

३.४३.१२–१८
> ये बहिष्कृत श्लोक युद्ध की भयंकर उथल-पुथल का वर्णन जारी रखते हैं। जलती लकड़ियों के टुकड़े तेजी से आकाश में उड़ते हैं, आकाश चमकता है, क्षेत्रों के घरों से अग्नि पर्वतों जैसी जल रही है, सेनाएँ और नगर गिर रहे हैं, तेज कोयले और धुआँ बादलों जैसे भर रहे हैं, कठोर चीखें लोगों को जला रही हैं, और भीड़ की उग्र गर्जनाएँ—यह सब युद्धक्षेत्र पर पूर्ण विनाश और भयावहता का दृश्य बनाता है।

३.४३.१९–२०  
> आकाश तरल तारों और जलते लकड़ी के टुकड़ों से काँप रहा है; एक-दूसरे के क्षेत्रों के घरों से जलती अग्नि पर्वत बन रही है।
> मारी गई सेना और नगर गिर रहे हैं; तेज कोयले और धुएँ के छिद्र भर रहे हैं; कठोर चीखें लोगों को जला रही हैं, भीड़ की उग्र गर्जना हो रही है।

उपदेश का विस्तृत सार:
मुख्य शिक्षा यह है कि शारीरिक मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक संक्रमण है। युद्ध में राजा की मृत्यु को आवश्यक बताया गया है ताकि वह अपना "पूर्व राज्य" पाए, जो शरीर से परे आत्मा की शाश्वत अवस्था का प्रतीक है। संसार और उसकी संपत्ति केवल दृष्टि से वास्तविक लगते हैं, पर वे क्षणभंगुर और स्वप्न जैसे हैं।

वायु रूप में यात्रा का निर्देश आत्मा के अमूर्त स्वरूप को दर्शाता है। शरीर केवल शव है जिसे प्राप्त या त्यागना है, इससे वैराग्य की शिक्षा मिलती है। पशुओं की अलग-अलग चालें दिखाती हैं कि जीवन में मार्ग और तरीके अपनी प्रकृति और कर्म के अनुसार भिन्न होते हैं, पर सब क्षणिक हैं।

दूत के अचानक आना और शत्रु सेना व जलते नगर का जीवंत वर्णन संसार में परिवर्तन की अचानकता और हिंसा को दिखाता है। कोई राज्य, नगर या शक्ति स्थायी नहीं; विनाश अनिवार्य है, जैसे तूफान। यह वैराग्य जगाता है और भौतिक उपलब्धियों से लगाव की व्यर्थता सिखाता है।

कोलाहल, अग्नि, धुआँ और चीखों का वर्णन संसार के संघर्षों और इच्छाओं में निहित नरक जैसी पीड़ा को दर्शाता है। यह मन की उथल-पुथल का प्रतीक है जब वह माया में फँसा हो। शिक्षा है कि ऐसे दृश्य मन के प्रक्षेपण हैं, परम सत्य नहीं, और खोजी को इंद्रियों के कोलाहल से परे अटल आत्मा की ओर देखना चाहिए।

कुल मिलाकर, ये श्लोक अद्वैत ज्ञान सिखाते हैं: संसार युद्धक्षेत्र जैसा है जहाँ जन्म-मृत्यु और विनाश चलते रहते हैं, पर ज्ञानी इसे असत्य समझता है। सच्ची विजय राज्य जीतने में नहीं, बल्कि अपनी शाश्वत प्रकृति को जानने में है, जो शरीरों और युद्धों के चक्र से मुक्ति देती है। यह योगवासिष्ठ का मुख्य संदेश है—ज्ञान से मुक्ति।

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