Tuesday, January 20, 2026

अध्याय ३.२८, श्लोक ४७–६३

योगवशिष्ट ३.२८.४७–६३
(ये श्लोक एक अत्यंत सुंदर और मनमोहक उद्यान या स्वर्गीय बगीचे का चित्रण करते हैं, जिसमें प्राकृतिक सौंदर्य, ठंडक, सुगंध, पक्षियों और मधुमक्खियों की ध्वनियाँ, बहता जल, खिले फूल और जीवंत जीवन भरा है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
वातायनगुहानिर्यत्सोधविश्रान्तवारिदम् ।
पूर्णपुष्करिणीपङ्क्तिपूर्णराजपृथूत्तरम् ॥ ४७ ॥
नीरन्ध्रविटपिच्छायाशीतलामलशाद्वलम् ।
सर्वशष्पाग्रवार्बिन्दुप्रतिबिम्बिततारकम् ॥ ४८ ॥
अनारतपतत्फुल्लहिमवर्षसितालयम् ।
विचित्रमञ्जरीपुष्पपत्रसत्फलपादपम् ॥ ४९ ॥
गृहकक्षान्तरालीनमेघसुप्तचिरण्टिकम् ।
सौधस्थमेघविद्युद्भिरनादेयप्रदीपकम् ॥ ५० ॥
कन्दरानिलभांकारघनघुंघुममण्डपम् ।
चरच्चकोरहारीतहरिणीहारिमन्दिरम् ॥ ५१ ॥
उन्निद्रकन्दलोद्वान्तमांसलामोदमन्थरैः ।
मरुद्भिर्मन्दमायातुमारब्धैर्लोलपल्लवम् ॥ ५२ ॥
लावकालापलीलायामालीनललनागणम् ।
कोककोकिलकाकोलकोलाहलसमाकुलम् ॥ ५३ ॥
शालतालतमालाब्जनीलतत्फलमालिनम् ।
वल्लीवलयविन्यासविलासवलितद्रुमम् ॥ ५४ ॥
आलोलपल्लवलतावलितायनानामुत्फुल्लकन्दलशिलीन्ध्रसुगन्धितानाम् ।
तालीतमालदलताण्डवमण्डपानामारामफुल्लकुसुमद्रुमशीतलानाम् ॥ ५५ ॥
साराववारिचलनाकुलगोकुलानामानीलसस्यकुसुमस्थलशोभितानाम् ।
तीरद्रुमप्रकरगुप्तसरिद्रयाणां नीरन्ध्रपुष्पितलताग्रवितानकानाम् ॥ ५६ ॥
उद्यानकुन्दमकरन्दसुगन्धितानां गन्धान्धषट्पदकुलान्तरिताम्बुजानाम् ।
सौन्दर्यतर्जितपुरन्दरमन्दिराणां राजीवराजिरजसारुणिताम्बराणाम् ॥ ५७ ॥
रंहोवहद्गिरिनदीरवघर्घराणां कुन्दावदातजलदद्युतिभासुराणाम् ।
सौधस्थितोल्लसितफुल्ललतालयानां लीलावलोलकलकण्ठविहङ्गमानाम् ॥ ५८ ॥
उल्लासिकौसुमदलास्तरणस्थयूनामापादमावलितमाल्यविलासिनीनाम् ।
सर्वत्र सुन्दरनवाङ्कुरदन्तुराणां शोभोल्लसद्वरलताकुलमार्गणानाम् ॥ ५९ ॥
संजातकोमललतोत्पलसंकुलानां ।
तिष्ठत्पयोदपटसंवलितालयानाम् ।
नीहारहारहरितस्थलविश्रुतानां सौधस्थमेघतडिदाकुलिताङ्गनानाम् ॥ ६० ॥
नीलोत्पलोल्लसितसौरभसुन्दराणां हुंकारहारिहीरतोन्मुखगोकुलानाम् ।
विश्रब्धमुग्धमृगसारगृहाजिराणामुन्नृत्यबर्हिघनसीकरनिर्झराणाम् ॥ ६१ ॥
सौगन्ध्यमत्तपवनाहतविक्लवानां वप्रौषधिज्वलनविस्मृतदीपकानाम् ।
कोलाहलाकुलकुलायकुलाकुलानां कुल्याकुलाकलकलाश्रुतसंकथानाम् ॥ ६२ ॥
मुक्ताफलप्रकरसुन्दरबिन्दुपातशीताखिलद्रुमलतातृणपल्लवानाम् ।
लक्ष्मीमनस्तमितपुष्पविकासभाजां शक्नोति कः कलयितुं गिरिमन्दिराणाम् ॥ ६३ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.२८.४७–५२
> इसमें गुफा जैसे खिड़कियों से ठंडी विश्राम करती बादल निकलते हैं, और पूर्ण कमल तालाबों की पंक्तियाँ तथा विशाल राजसी मैदान भरे हैं।
> घने बिना छेद वाले पत्तों की छाया से ठंडा, ताज़ा हरा घास का मैदान, सभी घास की नोक पर ओस बिंदुओं में तारे प्रतिबिंबित।
> लगातार गिरते सफेद बर्फ जैसे फूलों की वर्षा से सफेद घर, विचित्र फूल, पत्ते और अच्छे फल वाले वृक्ष।
> घर के अंदर बादल लंबी पूंछ वाले पक्षियों की तरह सोते हैं, महलों पर बादलों की बिजली तेल रहित दीपक की तरह।
> गुफाओं में हवा की गूंज और गहरी आवाज़ वाले मंडप, घूमते चकोर, तोते, हिरण और हंसों का सुंदर घर।
> कोमल नए पत्ते निकलते हैं, मोटी मीठी सुगंध फैलाते हुए धीमी हवाएँ पत्तों को हिलाती हैं।

३.२८.५३–५८
> ऋतु की सुंदरता में खेलती सुंदर स्त्रियों के समूह, कोयल, सारस, मेंढक और कौवों की कोलाहल से भरा।
> साल, ताड़, तमाल और नीले कमल फलों की मालाओं से युक्त, लताएँ वृक्षों को घेरकर खेलती हुई।
> हिलते पत्तों और लताओं से सजे खिड़कियाँ, खिले अंकुर और सुगंधित कवक, ताल और तमाल के पत्तों के नृत्य वाले मंडप, फूलों वाले ठंडे वृक्ष।
> हिलते जल से गायों के समूह, नीले खेतों और फूलों से सुशोभित, तट पर वृक्षों से छिपी नदियाँ, खिली लताओं के वितान।
> कुंद फूलों के मकरंद से सुगंधित, मधुमक्खियों से छिपे कमल, इंद्र के महल से बढ़कर सुंदर, कमल पराग से लाल आकाश।
> तेज बहती पहाड़ी नदियों की गर्जना, सफेद बादलों जैसी चमक, खिली लताओं वाले महल, मधुर गान वाले पक्षी।

३.२८.५९–६३
> फूलों की पंखुड़ियों पर लेटे युवा, सिर से पैर तक मालाओं से सजी स्त्रियाँ, हर जगह नए अंकुर और सुंदर लताएँ भरे रास्ते।
> कोमल कमल और लताओं से भरे स्थान, बादल जैसे वस्त्र से ढके घर, ओस की मालाओं से प्रसिद्ध हरे मैदान, बादल-बिजली से भरे आँगन।
> नीले कमल की सुगंध से सुंदर, मधुर गुंजार वाली गायों के झुंड, निर्दोष हिरणों के विश्राम वाले आँगन, नृत्य करते मोर और कोहरे की बौछारें।
> सुगंध से मतवाली हवाएँ कमजोर डालियाँ हिलाती हैं, औषधि पौधों की चमक से दीपक भूल जाते हैं, पक्षी घोंसलों और परिवारों से शोर, जल मार्गों में बातचीत की ध्वनि।
> मोती जैसे बिंदु गिरकर सभी वृक्ष, लता और घास को ठंडा करते हैं, फूल ऐसे खिलते जैसे मन सुंदरता में डूबा हो—इन पहाड़ी महलों का वर्णन कौन कर सकता है?

शिक्षा का विस्तृत सार:
ये श्लोक एक अत्यंत सुंदर और मनमोहक उद्यान या स्वर्गीय बगीचे का चित्रण करते हैं, जिसमें प्राकृतिक सौंदर्य, ठंडक, सुगंध, पक्षियों और मधुमक्खियों की ध्वनियाँ, बहता जल, खिले फूल और जीवंत जीवन भरा है। वसिष्ठ जी इस विस्तृत वर्णन से चेतना में प्रकट हुए जगत की प्रकृति दिखाते हैं। यह उद्यान जगत (सृष्टि) का प्रतीक है जो शुद्ध मन या ब्रह्म से उत्पन्न होता है और रूपों, रंगों, ध्वनियों और गतियों से भरा दिखता है।

ठंडी छाया, तारों को प्रतिबिंबित ओस बिंदु, लगातार कोमल हवाएँ और पक्षियों-जानवरों का सामंजस्य जगत की आनंदमय और पूर्णता की छवि दिखाते हैं। फिर भी यह सौंदर्य क्षणभंगुर और स्वप्न जैसा है, जो बादल, हवाएँ, फूल और जल जैसे बदलते तत्वों से बना है। यह शिक्षा देता है कि जगत आकर्षक होने पर भी मन की कल्पना मात्र है, अंततः सत्य या स्थायी नहीं, जो अद्वैत वेदांत की माया की अवधारणा से जुड़ा है।

महलों, बिजली के दीपक और स्वर्गीय तत्वों का बार-बार उल्लेख बताता है कि बड़े-बड़े निर्माण और दैवीय स्थान भी इस मिथ्या प्रदर्शन का हिस्सा हैं। कुछ भी एक चेतना से अलग नहीं; विविधता में एकता (जैसे लताएँ वृक्षों को गले लगातीं, मधुमक्खियाँ फूलों में) अद्वैत की ओर इशारा करती है, जहाँ सारी विविधता एक ही वास्तविकता में समाई है।

अंतिम श्लोक में प्रश्न ("इन पहाड़ी महलों का वर्णन कौन कर सकता है?") जगत के पूर्ण सौंदर्य को शब्दों में बयान करने की असंभवता दर्शाता है, जो भाषा और बुद्धि की सीमा दिखाता है। सच्ची समझ प्रत्यक्ष अनुभव से आती है, वर्णन से नहीं। यह साधक को बाहरी सौंदर्य से परे मुड़कर अपरिवर्तनीय साक्षी चेतना की ओर ले जाता है।

कुल मिलाकर, उत्पत्ति प्रकरण में ये श्लोक काव्यात्मक ढंग से दिखाते हैं कि कैसे अयथार्थ जगत यथार्थ और आकर्षक लगता है, सुखों से मन को बाँधता है। शिक्षा वैराग्य की है—ऐसे दिखावे से अलगाव, ताकि आकर्षक रूपों से परे आधारभूत ब्रह्म की पहचान हो और मुक्ति प्राप्त हो।

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